3 जून 2013 - 19:30
अब्बासी शासन के ख़िलाफ़ इमाम काज़िम अ. का जेहाद।

जिन लोगों नें भी इमामे मूसा काज़िम अ. की ज़िन्दगी और उनके ज़माने के इतिहास पर किताबें लिखीं हैं और रिसर्च की है, उन्हें एक चीज़ पर सबसे ज़्यादा रिसर्च करना चाहिये थी और लिखना चाहिये था और वह है हारून रशीद के जेल में उनकी ज़िन्दगी और वहाँ बैठ कर अब्बासी शासन के विरुद्ध उनका जेहाद, लेकिन अफ़सोस कि उन पर ज़्यादा रिसर्च नहीं हुई है और नाहि इतना लिखा गया है

जिन लोगों नें भी इमामे मूसा काज़िम अ. की ज़िन्दगी और उनके ज़माने के इतिहास पर किताबें लिखीं हैं और रिसर्च की है, उन्हें एक चीज़ पर सबसे ज़्यादा रिसर्च करना चाहिये थी और लिखना चाहिये था और वह है हारून रशीद के जेल में उनकी ज़िन्दगी और वहाँ बैठ कर अब्बासी शासन के विरुद्ध उनका जेहाद, लेकिन अफ़सोस कि उन पर ज़्यादा रिसर्च नहीं हुई है और नाहि इतना लिखा गया है। इमाम की ज़िन्दगी के कई पहलू बयान हुए हैं, उनका इल्म, उनकी इबादत, उनके शागिर्द, उनकी हदीसें। लेकिन उनकी ज़िन्दगी की सबसे अहम चीज़ यानी उनके जेहाद की तरफ़ बहुत कम ध्यान दिया गया है जबकि यह सारी चीज़ें इस एक चीज़ के बिना अधूरी लगती हैं। जब तक इमाम की ज़िन्दगी के इस पहलू को पूरी तरह से बयान नहीं किया जाएगा, इमाम की ज़िन्दगी के दूसरे पहलू सही तरह से समझ में नहीं आएंगे बल्कि यह कहा जाए कि यही एक पहलू है जो इमाम की ज़िन्दगी के हर पहलू को अपने साथ जोड़ता है।क्या हमनें सोचा है कि इमामे सादिक़ अ. नें मुफ़ज़्ज़ल से यह क्यों कहा कि इस जवान (इमामे काज़िम) की इमामत के बारे में केवल उन लोगों को बताना जिन पर तुम्हे पूरा भरोसा हो। अबदुर्रहमान इब्ने हज्जाज नें इमामे काज़िम अ. के बारे में इशारों में बात क्यों कही। इसके सीने पर यह कवच बिल्कुल फ़िट है। या सफ़वान और अपने दूसरे क़रीबी साथियों से इमाम नें खुलकर अपनी इमामत के बारे में बात क्यों नहीं की या अपनी वसीयत में इमामे सादिक़ अ. नें अपने जानशीन व उत्तराधिकारी के तौर पर पाँच लोगों (मनसूर अब्बासी, मदीने का गवर्नर, दो औरतें और इमामे काज़िम) का नाम लिखा और इमाम का नाम सबसे आख़िर में क्यों लिखा, जिसकी वजह से बहुत से बड़े बड़े शिया भी नहीं जानते थे कि उनका इमाम यही बीस साल का जवान है।अली इब्ने यक़तीन जो इमाम के साथी और हारून के मंत्री थे उन्हें इमाम काज़िम अ. नें वुज़ू के बारे में तक़य्ये का हुक्म क्यों देते हैं, और सफ़वाने जमाल को इसी बादशाह को अपने ऊँट किराये पर देने से मना क्यों करते हैं और उन्हें ख़लीफ़ा से दूर रहने को कहते हैं, इतने साल जेल में रहने के बाद भी इतने ज़्यादा लोगों के साथ किस तरह जुड़े रहते हैं और इतना मज़बूत नेटवर्क किस तरह बनाते हैं।मन्सूर, महदी, हारून और हादी हर एक उन्हें सलाख़ों के पीछे बंद रखने और क़त्ल करने की कोशिश क्यों करता है, एक रिवायत के अनुसार ऐसा क्यों होता है कि एक समय में इमाम वहाँ से निकल जाते हैं और ख़लीफ़ा अपने आदमियों को इमाम के पीछे भेजता है और इमाम अपने साथियों और जानने वालों से कहते हैं कि अगर किसी नें मेरे बारे में पूछा तो उससे कह देना कि हम नहीं जानते कि कहाँ हैं।ऐसा क्यों होता है कि हज के एक सफ़र में हारून उनकी ख़ूब आहो भगत करता है और उनका आदर करता है लेकिन दूसरे सफ़र में उन्हें गिरफ़्तार करने और शहर से बाहर निकालने का हुक्म देता है।ऐसा क्यों होता है कि जब हारून रशीद ख़लीफ़ा बनता है तो शुरू शुरू में इमाम और उनके मानने वालों के साथ बड़ी नरमी का व्यवहार करता है, उन्हें माफ़ करता है, जो जेल में थे उन्हें आज़ाद करता है, बाग़े फ़िदक को वापस लौटाने की बात करता है यहाँ तक कि इमाम से कहता है कि आप मेरी जगह तख़्त पर बैठ जाएं और फिर यही ख़लीफ़ा इतना क्यों बदल जाता है कि इमाम को गिरफ़्तार करवा के जेल में डालता है, उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ाएं देता है, बंद कोठरियों में रखता है और फिर आख़िर में वहीं पर ज़हर देकर शहीद कर देता है। इस तरह की बहुत सी चीज़ें और बहुत सी घटनाएं हैं जो इमाम की ज़िन्दगी और हिस्ट्री में मिलती है जिनमें बहुत सी एक दूसरे के विपरीत हैं, बहुत सी समझ में न आने वाली हैं, ऐसा लगता है जैसे उनका आपस में कोई सम्बंध नहीं है लेकिन जब इमाम की इमामत की शुरूवात से उनकी शहादत तक एक एक कड़ी को मिलाकर देखेंगे तो यह सारी बाते समझ में आएंगी।जेहाद का यह सिलसिला तमाम इमामों के ज़माने में रहा है बल्कि ग़ैबत से पहले 250 साल तक यह जेहाद जारी रहा है जिसका मक़सदः1. सही इस्लाम पेश करना, क़ुरआने करीम की सही तफ़सीर करना और इस्लाम की सही शिक्षा पहुँचाना था।2. इमामत के अक़ीदे को सही तौर से बयान करना और इस्लामी समाज में इस्लामी हुकूमत और उसमें इमाम के रोल को बयान करना था।3. ऐसे समाज की स्थापना की कोशिश जो रसूलुल्लाह का माडल समाज था, तमाम नबियों का एक सपना था यानी इन्साफ़ की हुकूमत बनाना, समाज में इन्साफ़ को ज़िन्दा करना, ज़ालिमों से हुकूमत छीनना और अल्लाह के सच्चे और नेक बंदे को देना।इमामे मूसा काज़िम अ. नें भी अपने जीवन में यही जेहाद किया और इसी जेहाद में अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा दी, उनकी क्लास, उनकी शिक्षाएं, उनकी फ़िक़्ह, उनकी हदीस, उनका तक़य्या और उनका सब कुछ इसी मक़सद को पूरा करने के लिये था। हालांकि उनके ज़माने के कुछ ख़ास हालात थे इस लिये उनका जेहाद भी ज़माने को देखते हुए ख़ास तरह का था, जिस तरह दूसरे इमामों के ज़माने के हालात अलग अलग थे और सबनें अपने ज़माने के हालात के हिसाब से जेहाद किया लेकिन कोई बैठा नहीं रहा बल्कि सबनें जेहाद किया। हाँ इसे समझनें की ज़रूरत है कि किस इमाम नें किस अन्दाज़ में जेहाद किया है।